Traversing down the memory lane

आज दूर बैठे बैठे घर की बड़ी याद आई। समझ नहीं आया आखिर कैसे रिझाये उजड़े मन को। घर, परिवार, बच्पन। सब जैसे खेलते खेलते ही निकल गया और अब हम सब इतने बड़े हो गये की बस यादें ही बची बाकी हैं| वो यादें जो हम आज कल की पीढ़ियों में शायद खोज भी नहीं सकते| हाँ, वक़्त बदला है और काफी बदल चुका है| हम सब भी खुद को बदलने की आनन फानन कोशिशों में तत्पर हैं, और शायद आधा अधूरा कुछ दिखावा सच्चा हो भी रहा है| बचपन की उन छोटी मोटी यादोें में एक छोटे से कोने में बंद कुछ चिट्ठियाँ है| नहीं आप यह न सोचें की अब हम आशिकी में उतर आयेँगे| जाने क्यों आजकल की जनता पत्र , सिर्फ़ प्रेमपत्र को ही मानती है। (क्योंकि शायद प्रेम यानी आर्चीज का वो महंगा वाला बड़ा भालू वाला कार्ड हो गया है, विथ आल माय हार्ट ई लव यू ) ?

स्कूल में हमको चिट्ठी लिखना सिखाया गया, बैंक अकाउंट का फॉर्म भरना, आवेदन पत्र लिखना। तब वो सब भले ही सर पर डंडा लगता था | पर अब आज के हालात देख कर लगता है हम तभी भले थे। हमारे नानाजी लेखक थे , सरकारी नौकरी CPWD से रिटायर्ड सिविल इंजीनियर। रिटायरमेंट के बाद सबसे ज्यादा काम जो उन्होंने हमसे कराये वो थे “चिट्ठियाँ लिखना “| बुढ़ापे में कपकपाती उंगलियाँ कूची न पकड़ पाती थी , लेकिन मन के विचार कागज़ पर उतरने से उन्होंने खुद को कभी नहीं रोका | सब नाती पोते बैठ जाते थे और नानाजी की डिक्टेशन स्टार्ट| “बच्चो मोतियों से अक्षरो में लिखो, की पढ़ने वालो को लगे की हमने समय लगाया है”|

मने की “टेम्पलेट” भी हो तोह वो भी १० जगह भेजने के लिए १५ बार लिखवाते थे नानाजी। रिजेक्ट हुई ५ चिट्ठियाँ या तोह स्पेलिंग मिस्टेक या गलत पंक्चुएशन मार्क्स की वजह से किनारे हो जाय करती थीं। हर चिट्ठी का लिख कर जवाब देना, हर किसी को लिख कर सम्मानित कर्ण| जो बात लिख के कही जाए वो भारी हो ही जाती है| कॉलोनी के डाकिया अंकल का भी अछा आना जाना रहता था, अब तो वो सब चिट्ठियां पिजन बॉक्स में ही छोड़ कर चले जाते हैं| आज भी याद हैं २ बजे अपराह्न , घण्टी बजती थी और नानाजी कहते थे, “आज किसका पोस्टकार्ड आया है”| एक हाथ से दाल चावल खाते हुय भी वो दुसरे हाथ से चिट्ठियां ज़रूर खोलते थे। और बोलते थे , भोजन के समय ही आता है ये !!!
जाने वो पीले हरे पोस्टकार्ड, वो बिदेस से आने वाला इनलैंड लेटर, जिसमे हम कोने कोने में छोटा सा लिखते थे की जगह खाली न बचे , जाने सब कहाँ चले गये. अब तोह राखियां भी लिफ़ाफ़े में अकेले ही आती हैं| सुनने में बस आता है, की भारत सरकार स्टाम्प निकाली कभी किसी की तोह कभी किसी की, लेकिन बिकते तो अब बस वो लाल रंग वाले रेवेनुए स्टैम्प्स हैं|
अपने ही घर क पुराने खतों को खोजिए, आप भी जानेंगे हाथों की मेहनत किसी प्रिंटर से बढ़ कर नहीं होती|
लिखा करें| ?

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